काठमांडो। नेपाल की भीषण बाढ़ के बाद मृतकों की पहचान और शवों के अंतिम संस्कार का संकट गहरा गया है। चितवन में बड़ी संख्या में ऐसे शव पहुंच रहे हैं, जिन्हें परिवारों तक सौंपने से पहले पहचान प्रक्रिया पूरी करना चुनौती बन गई है। सीमित फॉरेंसिक सुविधाओं और शव रखने की क्षमता के कारण प्रशासन ने कुछ शवों को अस्थायी रूप से दफनाना शुरू किया है। इसे लेकर हिंदू अंतिम संस्कार की परंपराओं की अनदेखी किए जाने के आरोप भी लग रहे हैं।
क्यों शवों को दफनाने पर मजबूर हुआ प्रशासन? : उन्होंने बताया कि कई शव करीब चार दिनों तक बाढ़ के पानी में डूबे रहे थे। बरामद किए जाने तक उनमें सड़ने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। इलाके में कई घर, वाहन और खेती में इस्तेमाल होने वाले ट्रैक्टर अब भी कीचड़ में आंशिक रूप से दबे हुए हैं। अधिकारियों के अनुसार, जिले में फॉरेंसिक सुविधाओं की कमी और शवों को रखने की सीमित क्षमता ने बड़ी संख्या में बरामद शवों के प्रबंधन की चुनौती को और बढ़ा दिया है।
ज्यादा नमी और तेज गर्मी से शवों के सड़ने की प्रक्रिया भी तेज हो गई। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि शवों को खुले में छोड़ने से बीमारी फैलने का खतरा बढ़ सकता है। रविवार को इलाके में नए भूस्खलन के कारण काठमांडू और चितवन को जोड़ने वाला मुख्य राजमार्ग बंद हो गया। यह मार्ग एक दिन पहले ही आंशिक रूप से खोला गया था। इसके बंद होने से शवों और राहत सामग्री को ले जाने का काम और मुश्किल हो गया है।
अंतिम संस्कार को लेकर लोगों में क्यों बढ़ी नाराजगी? : आपदा के बाद बचे लोगों के सामने मुश्किलें जारी हैं, वहीं शवों को दफनाने के फैसले की आलोचना भी बढ़ रही है। कुछ स्थानीय लोगों ने कहा कि मृतकों को अंतिम संस्कार के लिए कई दिनों तक इंतजार करना पड़ा और उन्हें मृत्यु के बाद भी सम्मान नहीं मिला।
लापता परिजनों की तलाश कर रहे परिवारों और कुछ सार्वजनिक हस्तियों ने भी सवाल उठाया कि क्या अधिकारियों ने बहुत जल्द यह कदम उठा लिया। यह मुद्दा नेपाल के लिए खास तौर पर संवेदनशील है। नेपाल में अधिकांश आबादी हिंदू है और यहां मृतकों का पारंपरिक रूप से अंतिम संस्कार किया जाता है।
लोगों ने उठाए क्या सवाल? : दो रिश्तेदारों के लापता होने की जानकारी देने वाली रूबी चौधरी ने कहा कि परिवारों की सहमति के बिना शवों को दफन नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “मृतकों के साथ सम्मान के साथ व्यवहार किया जाना चाहिए। हमारी परंपरा है कि नदी किनारे परिवार के करीबी सदस्यों की मौजूदगी में उनका अंतिम संस्कार किया जाए।”
नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई ने कहा कि खोज और बचाव अभियान पूरा होने से पहले और लापता लोगों के परिवारों से व्यापक विचार-विमर्श किए बिना अज्ञात शवों को दफनाना उचित नहीं था। उन्होंने शनिवार रात सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा कि अगर शव रखने के लिए मुर्दाघर की क्षमता पर्याप्त नहीं थी, तो अधिकारी आपातकालीन संसाधनों की मदद से अस्थायी मुर्दाघर या सुरक्षित शीत भंडारण सुविधाएं तैयार कर सकते थे।







