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कान्हा के जन्मोत्सव को लेकर मंदिरों में शुरू हुईं खास तैयारियां, मथुरा-वृंदावन में कब मनेगी जन्माष्टमी?

Janmashtami in Mathura-Vrindavan : भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को लेकर ब्रज में तैयारियां अब अंतिम चरण में हैं। मथुरा की जन्मभूमि से लेकर वृंदावन के प्रसिद्ध मंदिरों तक जन्माष्टमी को लेकर विशेष सजावट और धार्मिक आयोजनों की तैयारियां चल रही हैं।

मथुरा-वृंदावन में एक साथ श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता है। हालांकि, ब्रज के कुछ प्रमुख मंदिरों में जन्मोत्सव की परंपराएं अलग हैं। कहीं आधी रात में कान्हा का जन्मोत्सव होगा तो कहीं दिन में ठाकुरजी का प्राकट्योत्सव मनाया जाएगा। जानिए मथुरा-वृंदावन में जन्माष्टमी 2026 कब मनाई जाएगी।

राधारमण में दिन में उत्सव :  वृंदावन के राधारमण मंदिर में जन्माष्टमी की परंपरा कुछ अलग है। यहां रात के बजाय दिन में ठाकुरजी का प्राकट्योत्सव मनाया जाता है। 4 सितंबर को सुबह 9 बजे महाभिषेक शुरू होगा। दूध, दही, शहद, शर्करा, बूरा और जड़ी-बूटियों से करीब दो घंटे तक ठाकुरजी का अभिषेक किया जाएगा। शाहजी और राधादामोदर मंदिर में भी दिन में प्राकट्योत्सव होगा।

बांकेबिहारी मंदिर में खास परंपरा :  ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर में रात 12 बजे पंचामृत से ठाकुरजी का महाभिषेक किया जाता है। हालांकि इस विशेष अनुष्ठान के दौरान श्रद्धालुओं को दर्शन नहीं मिलते। जन्माष्टमी पर मंदिर की परंपराओं के अनुसार विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

निशीथ काल में जन्म :  मथुरा के पंचांग के अनुसार, 4 सितंबर की रात 11 बजकर 56 मिनट से 5 सितंबर की रात 12 बजकर 41 मिनट तक निशीथ काल रहेगा। इसी अवधि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का मुख्य पूजन, अभिषेक, आरती और जन्मोत्सव किया जाएगा।

कान्हा के जन्मस्थान पर विशेष आयोजन :  मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर 4 सितंबर को भव्य जन्मोत्सव होगा। श्रद्धालुओं के लिए प्रवेश सुबह 5.30 बजे से रात 1.30 बजे तक रहेगा। प्रेम मंदिर, इस्कॉन मंदिर, चंद्रोदय मंदिर, रंगजी मंदिर समेत अन्य प्रमुख मंदिरों में भी जन्माष्टमी की तैयारियां जोरों पर हैं।

तारीख को लेकर क्यों रहता है भ्रम? :  जन्माष्टमी की तारीख को लेकर अलग-अलग परंपराओं के कारण कभी-कभी भ्रम की स्थिति बनती है। गृहस्थों की स्मार्त परंपरा में निशीथ काल में पड़ने वाली अष्टमी को महत्व दिया जाता है। जबकि, वैष्णव परंपरा में अष्टमी तिथि के साथ रोहिणी नक्षत्र और अन्य पंचांग नियमों को भी ध्यान में रखा जाता है। इसी वजह से अलग-अलग स्थानों या परंपराओं में जन्माष्टमी की तारीख अलग हो सकती है।

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