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कोरबा

अहिल्या की तरह श्रापित होकर दूल्हा-दुल्हन और बाराती बने पत्थर की शीला, मांगलिक कार्यक्रम से पहले होती है पूजा


कोरबा। कोरबा का ऐसा गांव जहां अहिल्या की तरह श्रापित होकर दूल्हा-दुल्हन और बाराती पत्थरों की शीला में तब्दील हो गए। श्रीराम ने वनवास के दौरान अहिल्या का उद्धार किया, लेकिन यहां के पत्थर बने दुल्हा-दुल्हन और बाराती का श्रीराम उद्धार करेंगे, यह समय के गर्त में है। कहा जाता है कि तभी से इस गांव में होने वाली शादियों में दुल्हन को पौ फटने से पहले ही विदा कर दिया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि करीब 100 साल पहले यह अनोखी घटना घटित हुई थी।कोरबा-चांपा मार्ग पर स्थित बरपाली के आश्रित ग्राम डोंगरीभाठा में पिछले 100 साल से एक अनोखी परंपरा निभाई जा रही है। ग्रामीणों की मान्यता है कि वर्षों पहले यहां से गुजर रहे बारातियों समेत दूल्हा-दुल्हन का पूरा परिवार पत्थरों में बदल गया। इसका कारण कोई नहीं जानता, लेकिन कहा जाता है कि तभी से इस गांव में होने वाली शादियों में दुल्हन को पौ फटने से पहले ही विदा कर दिया जाता है। इस डर से कि कहीं सभी पत्थर न बन जाएं। आमतौर पर देखा जाता है कि ग्रामीण अंचलों में गांव में प्रवेश द्वार के पास ठाकुर देवता की पूजा ग्रामीणों द्वारा की जाती है, लेकिन करतला विकासखंड के ग्राम डोंगरीभाठा में स्थिति कुछ अलग है. यहां भी ठाकुर देवता तो विराजमान है लेकिन गांव के लोग उनसे पहले दूल्हा-दुल्हन का रूप कहे जाने वाले कुछ शिलाओं को पूजते है। ग्रामीणों का कहना है कि करीब 100 साल पहले जब डोंगरीभाठा महज एक टोला था और कुछ परिवार ही यहां रहा करते थे, तब एक अनोखी घटना घटित हुई थी। गांव के बैगा (पुजारी) 70 वर्षीय टिकैत राम ने बताया कि यहां मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है। हर तीन साल में यहां धूम-धाम से त्रिशाला पूजा की जाती है। प्रथम पूज्य ठाकुर देव होते है, जिनकी महिमा अपरंपार है, लेकिन बुजुर्गों के बताए नियम पर सबसे पहले दूल्हा-दुल्हन और बारातियों की पूजा होती है और उसके बाद ठाकुर देवता की। बैगा के अनुसार शादी से पहले लड़का हो या लड़की, दोनों ही यहां आकर नारियल फोड़ते है, ताकि विवाह संस्कार में कोई बाधा न हो, यह नियम गांव के प्रत्येक निवासी के लिए अनिवार्य है, जिसका आज भी पूरी श्रद्धा से पालन किया जाता है। गांव की बुजुर्ग महिला बताती है कि बाराती और दूल्हा-दुल्हन लंबे सफर से थककर यहां आराम करने बैठे और खाना खाकर बातें करने लगे। इस दौरान समय का पता ही नहीं चला और सुबह हो गई। सूरज की पहली किरण के साथ सभी पत्थर बन गए। तब डोंगरीभाठा में ज्यादा लोग नहीं थे और पत्थर बने बाराती और दूल्हा-दुल्हन भी कुछ एक बित्ते भर की लंबाई के थे। धीरे-धीरे 100 साल गुजर गए और सभी बढ़ते-बढ़ते आज तीन गुना आकार के हो गए हैं। टिकैतराम ने बताया कि पूरा गांव इस मान्यता का अनुशरण करता है और इतना ही नहीं, कभी भी गांव में कभी कोई बीमारी और संकट आने वाला होता है तो पहले ही पता चल जाता है। गांव में वर्षों से ऐसी मान्यता चली आ रही है, लोग श्रद्धा के साथ पत्थर में तब्दील दूल्हा-दुल्हन व बारातियों की पूजा-अर्चना कर खुशहाली का आशीर्वाद मांगते है।

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