‘छेर छेरा ! कोठी के धान ला हेर हेरा !’ यही आवाज़ आज प्रदेश के ग्रामीण अंचल में गूंजी और दान के रूप में धान और नगद राशि बांटी गई।
छेरछेरा छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख त्योहार है। नई फसल के घर आने की खुशी में अन्नदान और फसल उत्सव के रूप में पौष मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन युवक घर-घर जाकर डंडा नृत्य करते हैं और अन्न का दान मांगते हैं। धान मिंसाई हो जाने के चलते गांव में घर-घर धान का भंडार होता है, जिसके चलते लोग छेर छेरा मांगने वालों को दान करते हैं।
वर्ष 2026 में पौष पूर्णिमा 3 जनवरी 2026 को है तो छेरछेरा भी इसी दिन मनाया जा रहा है। इसी दिन पूरे छत्तीसगढ़ में छेरछेरा पुन्नी मनाई जाएगी। यह तिथि बेहद खास होती है, क्योंकि यह नई फसल के आगमन का त्योहार है। कई लोग इस दिन शाकंभरी देवी की पूजा करके उन्हें नई फसल अर्पित करते हैं, जिन्हें अन्नपूर्णा का रूप माना जाता है।
कब हुई शुरुवात
पांडुलिपियों के अनुसार, कलचुरी राजवंश के नरेश कल्याणसाय व मण्डल के राजा के बीच विवाद हुआ, और इसके पश्चात तत्कालीन मुगल शासक अकबर ने उन्हें दिल्ली बुलावा लिया। कल्याणसाय 8 वर्षो तक दिल्ली में रहे। 8 वर्ष बाद कल्याणसाय राजधानी रतनपुर वापस पंहुचे। जब प्रजा को राजा के लौटने की खबर मिली, प्रजा पूरे जश्न के साथ राजा के स्वगात में राजधानी रतनपुर आ पहुंची। प्रजा के इस प्रेम को देख कर रानी फुलकेना द्वारा रत्न और स्वर्ण मुद्राओ की बारिश करवाई गई और रानी ने प्रजा को हर वर्ष उस तिथि पर आने का न्योता दिया। तभी से राजा के उस आगमन को यादगार बनाने के लिए छेरछेरा पर्व की शुरुवात की गई। राजा जब घर आये तब समय ऐसा था, जब किसान की फसल भी खलिहानों से घर को आई, और इस तरह जश्न में हमारे खेत और खलिहान भी जुड़ गए।
सबसे बड़ा लोक पर्व छेरछेरा पुन्नी सोमवार को राजधानी समेत पूरे प्रदेश में महादान के रूप में मनेगा। जितना हो सके, जो भी हो सके, एक दूसरे की मदद, सहयोग करने का संदेश यह पर्व देता है। कोरोनाकाल जैसे संकट के दौर में तो ये पर्व और अधिक प्रासंगिक हुआ है। जब अधिक से अधिक जरूरतमंदों की मदद में हाथ आगे बढ़ सके। छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा के इस पर्व पर द्वार-द्वार छेरी के छेरा छेरछेरा, माई कोठी के धान ल हेरहेरा की आवाज अपनी परंपरा और संस्कृति का आभास कराएगी। क्योंकि इसी बलबूते पर गांधी मैदान में सबसे पुराना कांग्रेस कमेटी का भवन इसी परंपरा से बना था।
पौष माह के पूर्णिमा तिथि पर यह पर्व धूमधाम के साथ मनाया जाता है। मान्यता यही कि किसान परिवारों की कोठी धान से छलकती है, उसी में से कुछ दान करने का पर्व है पुन्नी छेरछेरा। जोकि पूरे छत्तीसगढ़ में मनाए जाने वाला दान का महापर्व, जब यहां हर छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब के भेद को करने का संदेश देता है।
विशेषता यह कि शरीफ की फसल घर में आ जाने के बाद मनाया जाता है। इस दिन गांव हो या शहर बुजुर्ग, युवा, बच्चे छेरछेरा का उत्सव मनाते हैं। नाचते-गाते टोलियां बाजारों कॉलोनियों और मोहल्लों में पहुंचती हैं। छेरछेरा उत्सव में छत्तीसगढ़ी पकवान चीला, ठेठरी, खुरमी जैसे पकवान बनाकर अपने ईष्टदेवता, ग्रामदेवता और धरती माता की पूजा कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है, ताकि जीवन में खुशहाल बनी रहे। जिस शाकंभरी पूजा भी कहा जाता है।
यह है छेरछेरा की पौराणिक मान्यता
भगवान शिव भिक्षा मांगने पार्वती के घर गए थे। वह तिथि थी मौष महीने की पूर्णिमा। इसी मान्यता से छेरछेरा पर्व मनाया जाता है। जनमानस में प्रचलित कथा के अनुसार पार्वती से विवाह पूर्व भोलेनाथ ने कई किस्म की परीक्षाएं ली थी। उनमें एक परीक्षा यह भी थी कि वे नट बनकर नाचते-गाते पार्वती के घर भिक्षा मांगने पहुंचे और स्वयं ही अपनी निंदा करने लगे थे, ताकि पार्वती उनसे विवाह करने के लिए इंकार कर दें। परंतु ऐसा दृढ़ संकल्प की माता पार्वती नहीं डिगीं। वही छेरछेरा के रूप में मनाने की परंपरा है।
पौराणिक मान्यता
पौराणिक मान्यता के अनुसार आज ही के दिन भगवान शंकर ने माता अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगी थी, आज ही मां शाकम्भरी जयंती है। मां दुर्गा ने पृथ्वी पर अकाल और गंभीर खाद्य संकट से निजात दिलाने के लिए शाकम्भरी का अवतार लिया था. इसलिए इन्हें सब्जियों और फलों की देवी के रूप में भी पूजा जाता है।







