नई दिल्ली। 2025 को पहलगाम की बैसरन घाटी में हंसते-खेलते लोगों की खुशियां देखते ही देखते रूदन में बदल गईं। मानवता के दुश्मन आतंकियों ने मासूम बच्चों और पत्नियों के सामने परिवार के पुरुष सदस्यों को धर्म पूछकर गोलियों से भून दिया था। देश ने ऑपरेशन सिंदूर कर 22 निर्दोष लोगों के साथ हुई क्रूरता का बदला ले लिया, लेकिन उस खौफनाक दौर को यादकर आज भी प्रभावित परिवार सिहर उठते हैं।
परिजनों के घाव आज भी हरे
कानपुर के शुभम द्विवेदी के स्वजन उनकी यादों की धरोहर को सहेजे हुए हैं तो करनाल के लेफ्टिनेंट विनय नरवाल के स्वजन चाहकर भी उस काले दिन को भूल नहीं पा रहे। कानपुर के रघुवीर नगर हाथीपुर निवासी सीमेंट कारोबारी संजय द्विवेदी व स्वजन के दिल पर बने घाव आज भी हरे हैं। उनके पुत्र शुभम द्विवेदी की नवविवाहिता एशान्या के हाथों की मेंहदी भी सही ढंग से छूट नहीं पाई थी कि दोनों की हंसती-खेलती दुनिया उजड़ गई।







