नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने नौकरी के दौरान मिसकंडक्ट यानी कदाचार पर सजा सुनाए जाने के संबंध में महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि नौकरी से बर्खास्तगी सबसे कड़ी सजा है। इसलिए बर्खास्तगी का कदम सिर्फ उन्हीं मामलों में उठाया जाना चाहिए जहां दुर्व्यवहार बहुत गंभीर हो और किसी तरह की नरमी या सहानुभूति दिखाना गलत या अनुचित हो।
जांच के दौरान निलंबन की अवधि को नौकरी से बर्खास्तगी के अलावा दूसरी सजा के तौर पर नहीं लगाया जा सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि नौकरी से बर्खास्तगी को आम तौर पर तब सही माना जाता है, जब गलत व्यवहार इतना गंभीर हो कि कर्मचारी का बने रहना अनुशासन, भरोसे, या संस्थान के कामकाज के बिल्कुल खिलाफ हो। अगर गलत व्यवहार में भ्रष्टाचार अनैतिक आचरण, गबन या नियोक्ता को साबित नुकसान शामिल नहीं है, और कर्मचारी का सेवाकाल बिना किसी बड़े दाग-धब्बे के लंबा रहा है तो अनुशासनात्मक अधिकारी को सावधानी से यह देखना चाहिए कि क्या कोई हल्की सजा देने से न्याय का मकसद पूरा हो सकता है।
न्यायमूर्ति संजय करोल और एन. कोटीश्वर सिंह की पीठ ने 11 जून के अपने एक फैसले में महाराष्ट्र की बिजली वितरण कंपनी की एक महिला कर्मचारी को नौकरी से बर्खास्त करने के आदेश को सही ठहराने वाले बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला खारिज कर दिया। कहा कि नौकरी से निकालना सबसे कठोर सजा में से है, इसलिए अनुशासनात्मक अधिकारी को संबंधित चीजों जैसे कदाचार की प्रकृति और गंभीरता, लंबी सेवा रिकॉर्ड, उम्र, कंपनी को कोई आर्थिक नुकसान न होना, आदि पर विचार करने के बाद सजा देनी चाहिए।







