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छत्तीसगढ़

परशाहीबाना में मकान की खुदाई के दौरान दुर्लभ मूर्तियां सैकड़ों साल पुराने सिक्के मिले

जांजगीर-चांपा। जिले के अकलतरा थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम परसाही बाना में एक मकान की नींव खुदाई के दौरान दुर्लभ मूर्तियां और ब्रिटिशकालीन सिक्का मिलने का मामला सामने आया है। पुलिस ने सभी सामग्रियों को अपने कब्जे में लेकर सुरक्षित रख लिया है और आगे की वैज्ञानिक जांच के लिए रायपुर स्थित पुरातत्व विभाग को पत्र भेजा है।

जानकारी के अनुसार, गांव के निवासी संपत कंवर अपने नए मकान का निर्माण कार्य करा रहे हैं। इसी दौरान उन्हें रात में सपना आया कि उनके घर की नींव के नीचे सोने की मूर्तियां और अष्टधातु के प्राचीन सिक्के गड़े हुए हैं। सुबह उठकर सपंत कंवर ने तंत्र-मंत्र और पूजा-पाठ के माध्यम से मूर्तियों को बाहर निकालने के लिए गांव के एक बैगा (पुजारी) को बुलाया।

बंटवारे को लेकर बैगा और गृहस्वामी में विवाद

बैगा ने पूजा-पाठ कर जैसे ही जमीन के नीचे से मूर्तियों और सिक्के को निकाला, तो सोने की चमक देखकर उसकी नीयत बिगड़ गई। मूर्तियों को लाखों रुपए की कीमत का मानकर बैगा उन्हें खुद रखने की जिद करने लगा। वहीं, संपत कंवर का कहना था कि संपत्ति उनके घर की जमीन से निकली है, इसलिए इस पर उनका अधिकार है। विवाद बढ़ता देख संपत कंवर ने तुरंत अकलतरा पुलिस को मामले की सूचना दी।

सूचना मिलते ही अकलतरा पुलिस मौके पर पहुंची और मूर्तियों व सिक्के को जब्त कर थाने में सुरक्षित रखवा दिया। बरामद हुए सिक्के पर ईस्ट इंडिया कंपनी और सन 1818 अंकित है, जिससे इसके ब्रिटिशकालीन होने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि, पुलिस ने अभी मूर्तियों की धातु (सोना या अष्टधातु) होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

अकलतरा थाना प्रभारी जय कुमार साहू ने बताया कि बरामद की गई मूर्तियां और सिक्के बेहद प्राचीन प्रतीत होते हैं। असली धातु और इनके ऐतिहासिक महत्व की पुष्टि केवल पुरातत्व विशेषज्ञ ही कर सकते हैं। इसके लिए रायपुर पुरातत्व विभाग को पत्राचार किया गया है। विभाग की टीम जल्द ही आकर इन अवशेषों की जांच करेगी, जिसके बाद ही इनकी वास्तविक कीमत और इतिहास का पता चल सकेगा।

भारतीय खजाना खोज अधिनियम के अनुसार, जमीन के नीचे दबी कोई भी प्राचीन संपत्ति या ऐतिहासिक वस्तु पूरी तरह से सरकार की होती है। यदि किसी निजी जमीन से पुरानी मूर्तियां, सिक्के या धातु मिलती हैं, तो भू-स्वामी या खोजकर्ता उसे आपस में नहीं बांट सकते। इसकी तत्काल सूचना स्थानीय प्रशासन को देना अनिवार्य होता है, जिसके बाद पुरातत्व विभाग ही इसके संरक्षण और मूल्य का निर्धारण करता है।

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