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Utpanna Ekadashi 2025 : इस मुहूर्त में पूजा करने से बरसेगी प्रभु श्रीहरि की कृपा

नई दिल्ली। पंचांग के अनुसार, हर साल मार्गशीर्ष माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि पर उत्पन्ना एकादशी का व्रत किया जाता है। ऐसे में इस बार यह व्रत 15 नवंबर को किया जाएगा। हम आपको बताने जा रहे हैं कि एकादशी के दिन किस समय में आपको पूजा-पाठ या किसी भी प्रकार के शुभ कार्य को करने से बचना चाहिए।

विधिपूर्वक एकादशी व्रत करने से साधक को भगवान विष्णु की कृपा की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। मार्गशीर्ष माह में किए जाने वाले उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi 2025) के दिन अगर आप इन बातों का ध्यान रखते हैं, तो इससे आपको प्रभु श्रीहरि की कृपा की प्राप्ति हो सकती है। चलिए जानते हैं इस बारे में।

इस समय में न करें पूजा- राहुकाल के समय में किसी भी तरह का शुभ कार्य करना या पूजा-पाठ करना शुभ नहीं माना जाता है। ऐसे में उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi 2025) के दिन राहुकाल का समय कुछ इस प्रकार रहने वाला है –

राहुकाल का समय – सुबह 9 बजकर 25 मिनट से सुबह 10 बजकर 45 मिनट तक

ऐसे में आपको इस समय में पूजा-पाठ या किसी भी तरह के शुभ कार्य को करने से बचना चाहिए, वरना आपको उस कार्य का शुभ परिणाम प्राप्त नहीं होता।

इस समय में करें पूजा –

अभिजीत मुहूर्त – सुबह 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 27 मिनट से

विजय मुहूर्त – दोपहर 1 बजकर 53 मिनट से दोपहर 2 बजकर 36 मिनट से

गोधूलि मुहूर्त – शाम5 बजकर 27 मिनट से शाम 5 बजकर 54 मिनट से

इस तरह प्राप्त करें विष्णु जी की कृपा

उत्पन्ना एकादशी की पूजा में भगवान विष्णु को पीला चंदन और पीले रंग के पुष्प अर्पित कर सकते हैं। इसके साथ ही प्रभु श्रीहरि के भोग में तुलसी दल भी जरूर शामिल करें। लेकिन साथ ही इस बात का भी ध्यान रखें कि एकादशी के दिन तुलसी तोड़ने की मनाही होती है, ऐसे में आप एक दिन पहले भी तुलसी के पत्ते उतारकर रख सकते हैं। इसके साथ ही एकादशी की पूजा में विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ करना भी काफी शुभ माना गया है।

करें इन मंत्रों का जप –

एकादशी के दिन भगवान विष्णु के मंत्रों का जप करना भी उनकी कृपा प्राप्ति का एक उत्तम उपाय माना गया है।

1. ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

2. ॐ वासुदेवाय विघ्माहे वैधयाराजाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात् ||

3. मङ्गलम् भगवान विष्णुः, मङ्गलम् गरुणध्वजः।
मङ्गलम् पुण्डरी काक्षः, मङ्गलाय तनो हरिः॥

4. शान्ताकारम् भुजगशयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्
विश्वाधारम् गगनसदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम् योगिभिर्ध्यानगम्यम्
वन्दे विष्णुम् भवभयहरम् सर्वलोकैकनाथम्॥

 

डिस्क्लेमर : उक्त लेख धार्मिक आस्था व लोक मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए  Today Studio उत्तरदायी नहीं है।

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