नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत ”आतंकी कृत्य” सिर्फ अंजाम देने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो योजना, समन्वय, लामबंदी या अन्य तरह की मिलीभगत वाली कार्रवाई के जरिये ऐसे कृत्यों को अंजाम देने में योगदान देते हैं।
यूएपीए की धारा-15 के तहत आतंकी कृत्य ऐसा कृत्य है जो भारत की एकता, अखंडता, सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा या संप्रभुता को खतरा पहुंचाने या खतरा पहुंचाने के इरादे से या भारत के लोगों या लोगों के किसी भी वर्ग में आतंक फैलाने या आतंक फैलाने के इरादे से किया गया हो। हालांकि इस प्रविधान में कहा गया है कि आतंक फैलाना ”बम, डाइनामाइट या अन्य विस्फोटक पदार्थों या ज्वलनशील पदार्थों या आग्नेयास्त्रों या किसी अन्य माध्यम से होता है।
अदालत ने क्या कहा?
उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इन्कार करते हुए जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने 142 पन्नों के फैसले में 1967 के अधिनियम की धारा 15(1)(ए) का हवाला देते हुए ”किसी अन्य माध्यम से” वाक्यांश पर गौर किया।
अदालत ने कहा कि कानून का इरादा आतंक की परिभाषा को हथियारों के इस्तेमाल तक सीमित करना नहीं था, जोर सिर्फ साधन पर नहीं, बल्कि कृत्य के डिजाइन, इरादे और प्रभाव पर है। पीठ ने कहा, ”धारा-15 को सिर्फ हिंसा के पारंपरिक तरीकों तक सीमित करना इसके दायरे को अनुचित रूप से संकीर्ण करना होगा, जो इसकी स्पष्ट भाषा के विपरीत है।







