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सुप्रीम कोर्ट का केंद्र सरकार को नोटिस, मुस्लिम पर्सनल लॉ के भेदभावपूर्ण प्रावधानों पर मांगा जवाब

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को मुस्लिम पर्सनल ला (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के कुछ प्रविधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा है। याचिका में इन प्रविधानों को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि ये महिलाओं के खिलाफ कथित तौर पर भेदभावपूर्ण हैं।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने याचिकाकर्ताओं पौलोमी पाविनी शुक्ला और न्याय नारी फाउंडेशन की ओर से मामले में पेश हुए वकील प्रशांत भूषण द्वारा दी गई दलीलों पर गौर किया और केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय को नोटिस जारी किया। याचिका में कहा गया है कि वर्तमान शरीयत उत्तराधिकार नियम महिलाओं के खिलाफ स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण हैं। इन नियमों के तहत महिलाओं को उनके पुरुष समकक्षों को मिलने वाले हिस्से का केवल आधा या उससे भी कम हिस्सा दिया जाता है।

न्यायिक अधिकारी और उनके परिजनों को मिली धमकी पर सुप्रीम कोर्ट ने दिए सुरक्षा के आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दिल्ली में सेवारत एक न्यायिक अधिकारी को सुरक्षा प्रदान करने के लिए पुलिस को निर्देश दिया है। न्यायिक अधिकारी का 2008 में अपहरण कर लिया गया था। उस समय वह नाबालिग थे।

अदालत ने सेवारत न्यायिक अधिकारी द्वारा दायर याचिका पर यह आदेश पारित किया, जिसमें अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई थी कि अपहरण मामले में दोषी ठहराए गए और आजीवन कारावास की सजा पाए लोगों द्वारा दी गई धमकियों के मद्देनजर उन्हें और उनके परिवार के सदस्यों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान की जाए।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जायमाल्य बागची और विपुल एम पंचोली की पीठ ने गुजरात पुलिस को भी निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता के भाई को कोई नुकसान न पहुंचे, जो खुद भी वहां एक न्यायिक अधिकारी हैं।

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