राजस्थान। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजस्थान के बालोतरा जिले के पचपदरा में देश की पहली ग्रीनफील्ड इंटीग्रेटेड रिफाइनरी राष्ट्र को समर्पित की है। यह भारत के ऊर्जा और पेट्रोकेमिकल क्षेत्र की बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
यह परियोजना हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) और राजस्थान सरकार का संयुक्त उपक्रम है। 90 लाख मीट्रिक टन प्रति वर्ष (एमटीपीए) क्षमता वाली इस ग्रीनफील्ड रिफाइनरी-कम-पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स को 79,450 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से विकसित किया गया है।
क्या होती है ग्रीनफील्ड रिफाइनरी ? : ग्रीनफील्ड रिफाइनरी वह होती है, जिसे पूरी तरह नई जगह पर शुरू से बनाया जाता है। पचपदरा परियोजना भी इसी तरह विकसित की गई है। इसका निर्माण 2018 में शुरू हुआ था और अब यह व्यावसायिक उत्पादन के लिए तैयार है। यह भारत की पहली ग्रीनफील्ड रिफाइनरी है, जिसे पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स के साथ विकसित किया गया है, और यह देश की 24वीं रिफाइनरी भी है।
यह अत्याधुनिक कॉम्प्लेक्स रिफाइनिंग और पेट्रोकेमिकल उत्पादन को एक साथ जोड़ता है। इसकी पेट्रोकेमिकल उत्पादन क्षमता 2.4 एमएमटीपीए (मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष) है। रिफाइनरी का नेल्सन कॉम्प्लेक्सिटी इंडेक्स (एनसीआई) 17.0 है और इसकी पेट्रोकेमिकल यील्ड 26 प्रतिशत से अधिक है, जो वैश्विक मानकों के अनुरूप है।
नेल्सन कॉम्प्लेक्सिटी इंडेक्स किसी रिफाइनरी की तकनीकी क्षमता और आधुनिकता को मापने वाला पैमाना है। इससे पता चलता है कि कोई रिफाइनरी कच्चे तेल को कितनी कुशलता से अधिक मूल्य वाले उत्पादों में बदल सकती है। वहीं पेट्रोकेमिकल यील्ड का मतलब है कि रिफाइनरी में प्रोसेस किए गए कुल कच्चे तेल में से कितना हिस्सा पेट्रोकेमिकल उत्पादों (जैसे पॉलीप्रोपाइलीन, पॉलिमर और अन्य रसायन) के रूप में निकाला जा सकता है।
रिफाइनरी की प्रमुख विशेषताएं क्या है?
- यह रिफाइनरी लगभग 4,400 एकड़ क्षेत्र में फैली है और इसका परिसर करीब 32 किलोमीटर की दूरी तक फैला है।
- इसकी वार्षिक कच्चा तेल प्रोसेसिंग क्षमता 90 लाख मीट्रिक टन प्रति वर्ष है।
- इसमें कुल 13 प्रसंस्करण इकाई हैं, जिनमें नौ रिफाइनरी और चार पेट्रोकेमिकल इकाई शामिल हैं।
- अधिकारियों के अनुसार, रिफाइनरी को इस तरह डिजाइन किया गया है कि कच्चे तेल से अधिकतम मूल्य प्राप्त किया जा सके।
- सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए परिसर में तीन समर्पित फायर स्टेशन बनाए गए हैं।
- इसे 27 एपीआई ग्रेड के कच्चे तेल को प्रोसेस करने के लिए डिजाइन किया गया है।
- यह अरब मिक्स सहित अलग-अलग ग्रेड के कच्चे तेल को जरूरत के अनुसार मिलाकर रिफाइन कर सकती है।
कच्चा तेल कहां से आएगा?
- रिफाइनरी को हर साल 90 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल की जरूरत होगी।
- इसमें से करीब 15 लाख टन कच्चा तेल राजस्थान के मंगला टर्मिनल से आएगा।
- बाकी 75 लाख टन कच्चा तेल गुजरात के मुंद्रा पोर्ट के जरिए आयात किया जाएगा।
- मुंद्रा से पचपदरा तक कच्चा तेल समर्पित पाइपलाइन नेटवर्क के जरिए पहुंचाया जाएगा।
तैयार ईंधन कहां जाएगा?
रिफाइनरी में बनने वाला पेट्रोल और डीजल एचपीसीएल की पाइपलाइन के जरिए गुजरात के पालनपुर तक भेजा जाएगा। वहां से इसे देशभर में वितरित किया जाएगा।
खास हीटिंग पाइपलाइन क्यों बिछाई गई?
कच्चे तेल की प्रकृति वैक्स (मोम जैसी) होती है। इसे पाइपलाइन में जमने से रोकने के लिए मुंद्रा से पचपदरा तक विशेष हीटिंग पाइपलाइन बिछाई गई है। इसमें जगह-जगह हीटिंग स्टेशन और थर्मल इंसुलेशन लगाया गया है, जिससे तेल का तापमान बना रहेगा।
रिफाइनरी से क्या-क्या फायदे ?
- यह भारत की ईंधन जरूरत का करीब 9-10 प्रतिशत हिस्सा पूरा करने की क्षमता रखती है।
- भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिलेगी।
- पेट्रोकेमिकल क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।
- पेट्रोकेमिकल और प्लास्टिक पार्क के विकास को बढ़ावा मिलेगा।
- डाउनस्ट्रीम और सहायक उद्योग विकसित होंगे।
- राजस्थान में औद्योगिक विकास को गति मिलेगी।
- निर्माण के दौरान करीब एक लाख लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिला, आगे भी रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
- पश्चिमी भारत ईंधन उत्पादन और वितरण का महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा।
राजस्थान केवल कच्चा तेल निकालने वाला राज्य नहीं रहेगा, बल्कि उसे प्रोसेस कर पॉलीप्रोपाइलीन, पॉलिमर जैसे वैल्यू-एडेड उत्पाद बनाने वाला हब बनेगा। इससे स्थानीय स्तर पर प्लास्टिक और केमिकल उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा।







