बिलासपुर। लिव-इन संबंध पर हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने कहा कि लंबे समय तक लिव-इन संबंध में रहने वाले वयस्कों के बीच शारीरिक संबंध सहमति से माने जाएंगे। पुरुष द्वारा बाद में शादी से इनकार करना बलात्कार नहीं माना जाएगा। यह फैसला एक महिला की अपील पर आया है।
40 वर्षीय महिला भिलाई नगर निगम में परियोजना प्रबंधक है। उसने आरोप लगाया कि वह 2019 में आईआईएम रायपुर में एमबीए करते समय आरोपी से मिली थी। महिला के अनुसार, आरोपी ने उससे शादी का आश्वासन दिया था। इसके बाद वे शारीरिक संबंध में आए और करीब दो साल तक साथ रहे।
उसने आरोप लगाया कि एमबीए पूरा होने के बाद आरोपी शादी की चर्चा से बचने लगा। बाद में उसने बताया कि उसके माता-पिता शादी के खिलाफ थे। इसका कारण महिला का उम्र में बड़ा होना, तलाकशुदा होना और ईसाई होना था। महिला ने आरोप लगाया कि 28 नवंबर 2021 को आरोपी ने उसकी इच्छा के विरुद्ध अप्राकृतिक यौन संबंध बनाया। दिसंबर 2022 में भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और 377 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई। हालांकि, निचली अदालत ने आरोपी को बरी कर दिया था। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष संदेह से परे आरोप साबित करने में विफल रहा।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां : हाईकोर्ट ने पाया कि महिला ने अपनी जिरह के दौरान स्वीकार किया था। वह महिला आयोग के समक्ष 30 लाख रुपये में विवाद निपटाने को तैयार थी। कोर्ट ने नोट किया कि आरोपी ने समझौते के तहत 15 लाख रुपये का चेक दिया था। लेकिन समझौता न होने पर चेक का भुगतान रोक दिया गया। पीठ ने महिला की बात पर ध्यान दिया कि वे परिवारों की सहमति से ही शादी करने पर सहमत थे। महिला के भाई ने गवाही दी कि शारीरिक संबंध प्रेम संबंध के कारण विकसित हुआ।
आरोपी का बरी करने का आधार : कोर्ट ने महिला की जांच करने वाले डॉक्टर की गवाही पर भी भरोसा किया। डॉक्टर ने कहा कि महिला ने मेडिकल जांच में जबरन या अप्राकृतिक यौन संबंध की शिकायत नहीं की। उसे कोई चोट भी नहीं मिली थी जो अप्राकृतिक यौन संबंध का सुझाव देती हो। इन साक्ष्यों के आलोक में, हाईकोर्ट ने माना कि निचली अदालत ने सही निष्कर्ष निकाला था।







