महिलाएं अक्सर शुभ कार्यों, त्योहारों के समय में पैरों में आलता लगाती हैं। ऐसा नहीं है कि आलता केवल पैरों या हाथों की शोभा बढ़ाता है बल्कि इससे हेल्थ को भी कई फायदे पहुंचते हैं।
पैरों में सजा लाल रंग का आलता पहली नज़र में यह सिर्फ एक सजावटी परंपरा लग सकती है, लेकिन इसके पीछे छिपी कहानी कहीं ज्यादा गहरी और दिलचस्प है। कई घरों में आज भी दादी-नानी बड़े स्नेह से बेटियों के पैरों में आलता लगाती हैं, जैसे कोई विरासत सौंप रही हों। यह सिर्फ श्रृंगार नहीं, बल्कि संस्कृति, आस्था और एक अनकही पहचान का हिस्सा है। सवाल उठता है आखिर क्यों सदियों से चली आ रही इस परंपरा को आज भी इतनी श्रद्धा से निभाया जाता है?
धार्मिक और सांस्कृतिक मायने : हिंदू परंपराओं में आलता का विशेष महत्व माना गया है। लाल रंग को ऊर्जा, शक्ति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, और यही कारण है कि इसे देवी लक्ष्मी से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि जिन घरों में महिलाएं आलता लगाती हैं, वहां सुख-समृद्धि बनी रहती है और नकारात्मकता दूर रहती है।
आलता को ‘सोलह श्रृंगार’ का अहम हिस्सा भी माना जाता है। शादी के समय दुल्हन के पैरों में इसे खास तरीके से लगाया जाता है, जिससे उसका रूप और भी निखर उठता है। खासकर बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में यह परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है जितनी पहले थी। दुर्गा पूजा, करवा चौथ और दिवाली जैसे त्योहारों में तो आलता के बिना श्रृंगार अधूरा सा लगता है।
पौराणिक संदर्भ और परंपरा की जड़ें : आलता का उल्लेख कई पौराणिक कथाओं में भी मिलता है। कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने राधा के पैरों में आलता सजाया था, जो प्रेम और सौंदर्य का प्रतीक बन गया। इसी तरह, देवी-देवताओं की मूर्तियों में भी लाल रंग से सजे चरणों को शुभ माना जाता है।
लोक जीवन में इसकी झलक : गांवों में आज भी खास अवसरों पर महिलाएं मिलकर एक-दूसरे के पैरों में आलता लगाती हैं। यह सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि एक सामूहिक अनुभव होता है जहां हंसी-मजाक, गीत और परंपरा सब एक साथ जुड़ जाते हैं।
क्या कहता है विज्ञान? : आलता के पीछे केवल धार्मिक मान्यता ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक कारण भी बताए जाते हैं। पुराने समय में इसे प्राकृतिक तत्वों से बनाया जाता था, जिसमें औषधीय गुण होते थे।
शीतलता और आराम : पैरों में आलता लगाने से ठंडक का अहसास होता है। गर्मियों में यह शरीर के तापमान को संतुलित रखने में मदद करता है।
त्वचा की सुरक्षा : प्राकृतिक आलता में मौजूद तत्व त्वचा को संक्रमण से बचाते हैं। यह एड़ियों को फटने से रोकता है और पैरों को मुलायम बनाए रखता है।
बदलते समय में भी कायम परंपरा : आज के आधुनिक दौर में भले ही फैशन और लाइफस्टाइल बदल गए हों, लेकिन आलता की परंपरा अब भी कायम है। हां, इसके रूप में थोड़ा बदलाव जरूर आया है अब बाजार में केमिकल आधारित आलता भी मिल जाता है, जो जल्दी सूखता है और लंबे समय तक टिकता है।
फिर भी, कई महिलाएं आज भी पारंपरिक तरीके से बने आलता को ही प्राथमिकता देती हैं। उनके लिए यह सिर्फ एक सौंदर्य प्रसाधन नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने का जरिया है।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं। Today Studio इनकी पुष्टि नहीं करता है। इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें।







