CG Ramnami Samaj : आज रामनवमीं हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। ऐसे में हर तरफ राम नाम की गूंज है। हर जगह जय श्रीराम, जय श्रीराम के जयकारें लग रहे हैं। लेकिन क्या आप ऐसे समुदाय से वाकिफ हैं जिन्होंने अपने शरीर को ही राम मंदिर बना लिया है। इस समुदाय के लोग अपने पूरे शरीर में राम नाम का गोदना गुदवा रखा है।
यह समुदाय राम नाम लिखवाकर लोगों को नशामुक्त होने का संदेश भी देते हैं। उनका कहना है कि लोग भोजन में शाकाहार लें और मन, वचन, कर्म से किसी को बिना कष्ट दिए भगवान राम के नाम का जाप करें। यह समुदाय गोदना के जरिए भगवान राम के प्रति अपनी भक्ति और आस्था का भाव प्रकट करते हैं।

छत्तीसगढ़ का यह संप्रदाय राम के नाम को अपने भीतर ऐसे समा लिया है कि अपने पूरे शरीर पर राम नाम का गोदना कर लिया है। उनके कपड़ों पर भी राम नाम लिखा रहता है। भक्ति भाव की ऐसी परंपरा देश में अन्य कहीं देखने को कम ही मिलती है। रामनामी संप्रदाय ने पूरी तरह अपने को राम के रंग में रंग लिया है। उनका पूरा जीवन अपने आराध्य की भक्ति में लीन है।
इन क्षेत्रों में बसते हैं ये समुदाय : इस संप्रदाय का बसेरा उन्हीं क्षेत्रों में है, जहां से भगवान श्रीराम के पवित्र चरण गुजरे और जिन्हें प्रदेश की सरकार श्रीराम वन गमन पथ के रूप में विकसित कर रही है। उनका बसेरा जांजगीर चांपा, शिवरीनारायण, सारंगढ़, बिलासपुर के पूर्वी क्षेत्र में है और अधिकतर ये नदी किनारे पाए जाते हैं। भगवान श्रीराम अपने वनवास के दौरान महानदी के किनारों से गुजरे और संभवतः इन इलाकों में रहने वाले लोगों को सबसे पहले उन्होंने अपने चरित्र से प्रभावित किया होगा।
मोर पंख धारण करता है यह समुदाय : उनका मानना है कि उनके भगवान भक्त के बिना अधूरे हैं। सच्चे भक्त की खोज भगवान को भी होती है। छत्तीसगढ़ में यह पद्य बहुत चर्चित है कि हरि का नाम तू भज ले बंदे, पाछे में पछताएगा जब प्राण जाएगा छूट। रामनामी संप्रदाय के हिस्से में इस पछतावे के लिए जगह ही नहीं है क्योंकि उनका हर पल राम के नाम में लिप्त है। न केवल राम का नाम बल्कि आचरण भी वे अपने जीवन में उतारते हैं। जिस तरह वे सुंदर मोर पंख धारण करते हैं, उसी प्रकार की मन की सुंदरता भी उनके भीतर है। भगवान श्रीराम का नाम और उनका आदर्श चरित्र उनके मन को निर्मल रखता है। मयूर की तरह ही सुंदर मन के साथ वे प्रभु की भक्ति में लीन रहते हैं।

तन से लेकर मन तक तक भगवान राम : छत्तीसगढ़ के रामनामी संप्रदाय के रोम-रोम में भगवान राम बसते हैं। तन से लेकर मन तक तक भगवान राम का नाम है। इस समुदाय के लिए राम सिर्फ नाम नहीं बल्कि उनकी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ये राम भक्त लोग ‘रामनामी’ कहलाते हैं। राम की भक्ति भी इनके अंदर ऐसी है कि इनके पूरे शरीर पर ‘राम नाम’ का गोदना गुदा हुआ है। शरीर के हर हिस्से पर राम का नाम, बदन पर रामनामी चादर, सिर पर मोरपंख की पगड़ी और घुंघरू इन रामनामी लोगों की पहचान मानी जाती है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की भक्ति और गुणगान ही इनकी जिंदगी का एकमात्र मकसद है। रामनामी संप्रदाय के पांच प्रमुख प्रतीक हैं। ये हैं भजन खांब या जैतखांब, शरीर पर राम-राम का नाम गोदवाना, सफेद कपड़ा ओढ़ना, जिस पर काले रंग से राम-राम लिखा हो, घुंघरू बजाते हुए भजन करना और मोरपंखों से बना मुकट पहनना है। रामनामी समुदाय यह बताता है कि श्रीराम भक्तों की अपार श्रद्धा किसी भी सीमा से ऊपर है।
क्या है राम-राम लिखाने की कहानी : छत्तीसगढ़ के पूर्वी और मैदानी क्षेत्रों में सतनाम पंथ के अनुयायी सतनामी समाज के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं। तत्कालीन समय में जब समाज में कुरीतियां काफी व्याप्त थीं। मंदिरों में प्रवेश पर कई तरह के प्रतिबंध थे। ऐसा माना जाता है कि वर्ष 1890 के आस-पास ऐसे समय में सतनामी समाज के ही एक सदस्य वर्तमान में जांजगीर-चांपा जिले के अंतर्गत ग्राम चारपारा निवासी परशुराम ने रामनामी पंथ शुरू की थी।
देते हैं शाश्वत सत्य का मंत्र : रामनामी समाज के लोगों के अनुसार शरीर में राम-राम शब्द अंकित कराने का कारण इस शाश्वत सत्य को मानना है कि जन्म से लेकर और मृत्यु के बाद भी पूरे देह को ईश्वर को समर्पित कर देना है। जब हमारी मृत्यु हो जाती है तो राम नाम सत्य है पंक्ति के साथ अंतिम संस्कार की ओर आगे बढ़ते हैं और राम नाम सत्य के उद्घोष के साथ ही पूरा शरीर राख में परिवर्तित हो जाता है। रामनामी समाज के लोग इस हाड़-मांस रूपी देह को प्रभु श्रीराम की देन मानते है। रोम-रोम में राम की उपस्थिति मानते हैं।







