उत्तरकाशी। झारखंड निवासी आनंद ने कहा कि उसका चचेरा भाई रंजीत भी सुरंग के अंदर फंसा हुआ है। तीन दिन पहले बात हुई थी, लेकिन पिछले तीन दिन से उससे बात करने का मौका नहीं मिल पाया है। वह पुलिस और प्रशासन से मांग कर रहे हैं कि उनकी बात कराई जाए। कोटद्वार निवासी जयमाल सिंह नेगी ने कहा कि रेस्क्यू कार्य तो चल रहा है पर प्रभावी नहीं है। बस केवल आश्वासन मिल रहा है।
आठ दिन से सुरंग में फंसे श्रमिकों के स्वजन के सब्र का बांध अब टूटने लगा है। श्रमिकों के स्वजन लगातार मांग कर रहे हैं कि सुरंग में फंसे श्रमिकों से उनकी बात कराई जाए, जिससे उन्हें यह पता चल सके कि सुरंग में फंसे उनके परिवार के सदस्य सकुशल हैं। झारखंड के जनपद रांची के खीराबेरा गांव निवासी 20 वर्षीय ओम कुमार ने बताया कि 14 दिन पहले तीन चचेरे भाईयों के साथ सिलक्यारा आया था। झारखंड में वह कोयले की खदान में काम करते थे। ठेकेदार ने उनसे कहा कि वह उत्तराखंड में एक सुरक्षित काम दिलवाएगा, परंतु यहां कुछ और ही देखने को मिला है। उसके चचेरे भाई 18 वर्ष का सुखराम बेदिया, 21 वर्ष का राजेंद्र बेदिया और 20 वर्ष का अनिल बेदिया रविवार की सुबह से सुरंग में ही फंसे हैं। ओम कुमार बेदिया ने कहा कि तीनों भाई सुरंग से बाहर निकलेंगे तो फिर यहां से सीधे घर जाएंगे।
बेटे की सलामती के लिए मां ने त्यागा अन्न जल
उत्तरकाशी सुरंग में फंसे श्रमिकों के साथ अब उनके स्वजन की हालत भी बिगड़ रही है। चंपावत निवासी पुष्कर सिंह ऐरी की मां गंगा देवी बेटे की चिंता में रो रही है और खाना भी छोड़ दिया है। गांव के लोग पुष्कर के परिवार का ढांढस बांध रहे हैं।
बेटे को मां की चिंता
सिलक्यारा में विक्रम सिंह ने अपने भाई से बात की तो पुष्कर ने सुरंग के अंदर से सबसे पहले यही कहा कि इस घटना की जानकारी मां को मत देना। मां परेशान हो जाएगी। विक्रम सिंह ने बताया कि पुष्कर का हालचाल जानने के लिए ग्रामीण जब घर पर पहुंचे तो मां को भी इस घटना के बारे में पता चला। पुष्कर के मामा महेंद्र सिंह ने बताया कि दो माह पूर्व ही उनका भांजा पुष्कर अपने घर छीनीगोठ आया था। पुष्कर से आखिरी बार 11 नवंबर को बात हुई थी। तब से बात नहीं हो पाई।







