अब बचत और भंडारण की आखिरी रास्ता
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच पिछले ढाई महीने से तनावपूर्ण हालात बने हुए हैं। इस दौरान रणनीतिक महत्व के समुद्री मार्ग होर्मुज स्ट्रेट पर भी ईरान और अमेरिका की नाकेबंदी जारी है। इस अहम मार्ग से सामान्य दिनों में दुनिया की जरूरत का 20 प्रतिशत तेल रोज विभिन्न देशों को भेजा जाता था। इसके लिए प्रतिदिन करीब 140 मालवाहक जहाज होर्मुज से गुजरते थे।
अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ ‘आपरेशन स्लेजहैमर’ के तहत नए सैन्य अभियान की आशंका के बीच सोमवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 111 डालर प्रति बैरल तक पहुंच गई। इससे वैश्विक तेल संकट गहराने की आशंका बढ़ गई है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और चीन जैसी महाशक्तियों पर इसका अपेक्षाकृत कम असर पड़ रहा है। अमेरिका जहां खुद बड़ा तेल उत्पादक देश है, वहीं चीन ने विशाल भंडारण क्षमता विकसित कर ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर लिया है। चीन की भंडारण क्षमता अमेरिका से तीन गुना ज्यादा बताई जाती है।
चीन और अमेरिका के बीच ऊर्जा सुरक्षा को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच यह सवाल अहम हो जाता है कि भारत इस मामले में कहां खड़ा है। भारत ने औपचारिक रूप से रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व) बनाने की दिशा में वर्ष 2004 में कदम बढ़ाया था।
आसान नहीं रणनीतिक तेल भंडार बनाना
अमेरिका और चीन जैसे देश बड़े पैमाने पर रणनीतिक तेल भंडार बनाने को लेकर आक्रामक हैं, लेकिन भारत के सामने भौगोलिक और तकनीकी चुनौतियां भी कम नहीं हैं। रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार तैयार करना बेहद जटिल और महंगी प्रक्रिया मानी जाती है। इन भंडारों के निर्माण के लिए समुद्री तटों के पास कठोर चट्टानी इलाकों में विशाल भूमिगत गुफाएं तैयार करनी पड़ती हैं। इसके लिए अत्याधुनिक टनल-बोरिंग मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है। यह पूरी इंजीनियरिंग प्रक्रिया बेहद महंगी और समय लेने वाली होती है।







