महालक्ष्मी व्रत मां लक्ष्मी की कृपा, सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य की कामना से जुड़ा खास व्रत माना जाता है। भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से शुरू होने वाला यह व्रत परंपरागत रूप से 16 दिनों तक चलता है। घर में सुख-समृद्धि की कामना से इस व्रत में श्रद्धा और नियम के साथ की गई पूजा की जाती है। अगर आप भी इस साल महालक्ष्मी व्रत रखने जा रहे हैं, तो जानिए इसकी शुरुआत से लेकर उद्यापन तक की पूरी विधि और यह वैभव लक्ष्मी व्रत से कैसे अलग है।
कब से शुरू होगा व्रत? : महालक्ष्मी व्रत भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से शुरू होता है। 2026 में महालक्ष्मी व्रत की शुरुआत 19 सितंबर, शनिवार से हो रही है और इसका समापन 3 अक्टूबर को होगा। अष्टमी तिथि 18 सितंबर दोपहर से शुरू होकर 19 सितंबर दोपहर तक रहेगी। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, व्रत 19 सितंबर से माना जाएगा। महालक्ष्मी व्रत 16 दिवसीय होता है। हालांकि, तिथियां घटने-बढ़ने के कारण किसी साल उपवास दिनों की संख्या 15 या 17 भी हो सकती है। पंचांग गणना के अनुसार, इस बार कुल 15 उपवास दिन पड़ रहे हैं।
वैभव लक्ष्मी से अंतर : महालक्ष्मी व्रत और वैभव लक्ष्मी व्रत एक नहीं है, दोनों में बहुत अंतर है। महालक्ष्मी व्रत भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से जुड़ी लंबी व्रत परंपरा है, जिसमें लगातार 16 तिथियों तक पूजा और संकल्प किया जाता है। वहीं, वैभव लक्ष्मी व्रत की शुरुआत आम तौर पर किसी भी शुक्रवार से की जा सकती है और 11 या 21 शुक्रवार तक इसका संकल्प लिया जाता है। दोनों में पूजा की परंपरा, विधि और व्रत की अवधि अलग है। शुक्रवार को मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के कुछ उपाय भी बताए गए हैं।
हाथी पूजा की परंपरा : मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में इसे हाथी पूजा से भी जोड़ा जाता है। परिवार मिट्टी या चांदी के हाथी पर देवी को विराजमान कर गजलक्ष्मी स्वरूप में पूजा करते हैं। कुछ जगह केले के पत्तों से सजावट की जाती है। सोलह गांठों वाला डोरा और जवारे पूजा में रखे जाते हैं। परंपरा के अनुसार अंतिम दिन विशेष पूजा की जाती है।
चूक जाएं तो क्या करें? : अगर यात्रा, अचानक आई किसी परेशानी के कारण व्रत के बीच एक दिन की पूजा या उपवास नहीं हो पाए, तो इसे अगले दिन जोड़कर व्रत पूरा करने की परंपरा है। यानी एक दिन का व्रत छूटा है, तो अंत में एक दिन बढ़ाकर संकल्प पूरा किया जा सकता है। हालांकि, लगातार कई दिन व्रत छूट जाने पर कुछ परंपराओं में इसे अधूरा माना जाता है और अगले भाद्रपद में दोबारा व्रत शुरू करने की मान्यता है। बुजुर्ग, गर्भवती स्त्री या अस्वस्थ लोग क्षमता अनुसार संक्षिप्त रूप में पूजा कर सकते हैं। मासिक धर्म के दौरान पूजा को लेकर अलग परंपराएं हैं, कुछ घरों में महिला स्वयं पूजा सामग्री को न छूकर मानसिक रूप से व्रत रखती है और परिवार का अन्य सदस्य पूजा करता है। ऐसे मामलों में अपने परिवार की परंपरा और पूजा-पद्धति के अनुसार नियम का पालन करना बेहतर है।
महालक्ष्मी व्रत विधि
16 गांठों वाला डोरा: व्रत के पहले दिन स्नान करके 16 तारों या धागों से एक विशेष डोरा तैयार किया जाता है। इसमें 16 गांठें लगाई जाती हैं। मां लक्ष्मी की पूजा करने के बाद इस डोरे को कलाई पर बांधा जाता है। इसे पूरे व्रत के दौरान संकल्प के प्रतीक के रूप में रखा जाता है।
दैनिक लक्ष्मी पूजा: व्रत के दिनों में सुबह और शाम मां लक्ष्मी की पूजा करने की परंपरा है। पूजा के दौरान धूप-दीप जलाकर माता को कमल गट्टे, लाल फूल और मिष्ठान अर्पित किए जाते हैं। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार मां लक्ष्मी का ध्यान और मंत्र जप भी कर सकते हैं।
समापन: आश्विन कृष्ण अष्टमी को मां महालक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है। इस दिन 16 मीठे पुए या पूड़ियों का भोग लगाते हैं। अंतिम दिन व्रत का उद्यापन किया जाता है। सुहागिन महिलाओं को दान-दक्षिणा देकर व्रत पूर्ण किया जाता है।







