नई दिल्ली । पश्चिम एशिया संघर्ष ने वैश्विक क्रूड बाजार में जिस तरह से आग लगाई है, उससे अभी तक तो आम जनता को बचाकर रखा गया है, लेकिन अब ज्यादा दिनों तक यह संभव नहीं दिख रहा। वजह यह है कि सरकार की तरफ से तमाम उपायों के बावजूद सरकारी क्षेत्र की तीनों तेल कंपनियों (इंडियन आयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम, भारत पेट्रोलियम) के लिए अब पेट्रो उत्पादों की बिक्री में होने वाले घाटा को सहना मुश्किल हो गया है।
पेट्रोलियम मंत्रालय का आंकलन है कि सिर्फ मार्च व अप्रैल के बीच उक्त तीनों कंपनियों को संयुक्त तौर पर 30 हजार करोड़ रुपये का घाटा हो गया है। अगर केंद्र सरकार ने उन्हें उत्पाद शुल्क में कटौती करके मदद नहीं की होती तो यह घाटा 62,500 करोड़ रुपये का हो गया होता।
केंद्र सरकार को राजस्व का नुकसान
पेट्रोलियम मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि जब कच्चे तेल की कीमत 120 डालर प्रति बैरल को पार गई थी, तब पेट्रोल पर प्रति लीटर लगभग 24 रुपये और डीजल पर लगभग 30 रुपये का बोझ उठाया था। केंद्र सरकार ने पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क को 13 रुपये से घटकर 3 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 10 रुपये से शून्य करके हानि को कम करने में मदद की है, लेकिन इससे केंद्र सरकार को भी राजस्व का नुकसान भी हुआ है। पश्चिम एशिया संघर्ष अब ग्यारहवें सप्ताह में प्रवेश कर चुका है और मौजूदा व्यवस्था अनिश्चितकाल तक नहीं चलाई जा सकती। वैसे भी दुनिया के बाकी देशों की तुलना में भारतीय ग्राहक अभी तक पेट्रो महंगाई से सुरक्षित रखे गये हैं।







