नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने वर्ष 2008 के दिल्ली सीरियल बम धमाकों के मामले में 17 वर्षों से जेल में बंद इंडियन मुजाहिदीन (आइएम) आपरेटिव मंसूर असगर पीरभाय की जमानत याचिका खारिज कर दी।
न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह और न्यायमूर्ति मधु जैन की पीठ ने कहा कि आरोपित लंबे समय से विचाराधीन कैदी है, लेकिन उसकी रिहाई से मुकदमे की सुनवाई प्रभावित होने और आम नागरिकों की सुरक्षा पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है।
आईएम के मीडिया सेल से जुड़ा था आतंकी
अदालत ने ट्रायल कोर्ट के 19 जुलाई 2025 के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि मामले में अभी दो गवाहों की जिरह पूरी होनी बाकी है। हालांकि ट्रायल कोर्ट को सुप्रीम कोर्ट के 30 अप्रैल के निर्देश के अनुरूप आठ माह के भीतर सुनवाई पूरी करने को कहा गया है। हाई कोर्ट ने 61 पन्नों के फैसले में कहा कि प्रथम दृष्टया पीरभाय प्रतिबंधित आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन के मीडिया सेल का प्रमुख था और धमाकों से कुछ मिनट पहले संगठन की ओर से जिम्मेदारी लेने वाला ई-मेल भेजने में उसकी केंद्रीय भूमिका थी।
26 लोगों की हुई थी मौत
अदालत ने कहा कि इस तरह के सिलसिलेवार धमाकों के लिए जिस स्तर की तकनीकी योजना, समन्वय और रीयल-टाइम संचार की आवश्यकता थी, उसमें आरोपित की भूमिका महत्वपूर्ण प्रतीत होती है।
13 सितंबर 2008 को करोल बाग, कनाट प्लेस और ग्रेटर कैलाश में हुए सिलसिलेवार धमाकों में 26 लोगों की मौत हुई थी और 135 लोग घायल हुए थे। अदालत ने कहा कि रिकार्ड पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर इस स्तर पर यह नहीं कहा जा सकता कि आरोपित दोषी नहीं है।







