Home » संघर्ष के बीच ऊर्जा के लिए कोयले पर नजर : भारत इसका बड़ा उत्पादक, फिर भी 25 करोड़ टन कोयला करना पड़ता है आयात
देश

संघर्ष के बीच ऊर्जा के लिए कोयले पर नजर : भारत इसका बड़ा उत्पादक, फिर भी 25 करोड़ टन कोयला करना पड़ता है आयात

India Coal Imports Explained: मध्य-पूर्व में चल रहे संघर्ष की वजह से जब तेल और गैस की आपूर्ति पर आफत आई, तो विश्व भर की नजरें वापस एनर्जी के पुराने और भरोसेमंद साथी ‘कोयले’ पर फिर से टिक गई हैं। इस परिस्थिति में भारत का मामला भी दिलचस्प है। भारत, दुनिया के चौथे सबसे बड़े कोयले के भंडार का मालिक है और कोयले का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश भी है। इतने बड़े भंडार और प्रोडक्शन के बावजूद भारत को हर साल करीब 25 करोड़ टन कोयला विदेशों से आयात करना पड़ता है। आखिर इसकी वजह क्या है? आइए इस ‘ब्लैक डायमंड’ यानी कोयले की इस पहेली को समझते हैं।

क्वालिटी की चुनौती :  दरअसल, भारत के सामने पहली चुनौती कोयले की ‘क्वालिटी’ की है। भारत में मौजूद खदानों से निकलने वाला अधिकतर कोयला ‘नॉन-कोकिंग’ कैटेगरी का है। आसान भाषा में समझें तो इसमें राख (Ash) की मात्रा 30 से 50 प्रतिशत तक पाई जाती है, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह 15 फीसदी से भी कम होती है। भारत की धड़कन कही जाने वाली स्टील इंडस्ट्री को मजबूत स्टील बनाने के लिए हाई क्वालिटी वाले ‘कोकिंग कोल’ की आवश्यकता होती है। चूंकि हमारे देश में इसकी भारी कमी है, इसी वजह से स्टील इंडस्ट्री की भट्ठियां आयातित कोयले पर ही ज्यादातर निर्भर हैं।

देश में तेजी से बढ़ती बिजली की मांग :  विदेश से कोयला इम्पोर्ट करने का दूसरा बड़ा कारण ‘तेजी से बढ़ती मांग’ है। भारत की इकोनॉमी और बिजली की डिमांड तेज रफ्तार से बढ़ रही है। खासकर चिलचिलाती गर्मियों में जब इलेक्ट्रिसिटी की मांग अपने चरम पर होती है, तो घरेलू कोयला उत्पादन इसका मुकाबला करने में मुश्किल का सामना करता है। इस डिमांड और आपूर्ति की खाई को पाटने के लिए देश को कई बार विदेशी कोयले का सहारा लेना पड़ता है।

कोयला आयात कम करने के प्रयास में भारत :  कोयल मंत्रालय की तरफ से जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत धीरे-धीरे इस इम्पोर्ट के चक्रव्यूह को तोड़ रहा है। इस साल देश के कोयला इम्पोर्ट में 7.9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई। जहां पिछले साल आयात 264.53 मीट्रिक टन था, वहीं ये इस बार घटकर 243.62 मीट्रिक टन हो गया। इस शानदार कटौती का सीधा लाभ देश के खजाने को हुआ। भारत ने विदेशी मुद्रा के तौर पर 7.93 अरब डॉलर यानी लगभग 60 हजार 681 करोड़ रुपये की बचत की!

इसमें सबसे खास बात है कि इस दौरान भारत के थर्मल पावर प्लांट्स का इलेक्ट्रिसिटी प्रोडक्शन 3.04 प्रतिशत बढ़ा है, फिर भी मिश्रण के लिए आयात किए जाने वाले कोयले में 41.4 फीसदी की जबरदस्त कमी आई है।

बेहतर स्ट्रैटेजी के साथ आत्मनिर्भर बन रहा भारत :  सच्चाई यह है कि भूगोल और कोयले की नेचुरल क्वालिटी जैसी मजबूरियां देश को आयात के लिए मजबूर करती हैं। लेकिन, डॉमेस्टिक प्रोडक्शन को बढ़ाकर और बेहतर स्ट्रैटेजी के माध्यम से भारत अब सही दिशा में आगे की तरफ बढ़ रहा है। इससे करोड़ों की विदेशी मुद्रा बच रही है और इससे भारत ने यह साबित किया कि वह अपनी एनर्जी जरूरतों के लिए धीरे-धीरे ही सही, लेकिन आत्मनिर्भरता की तरफ मजबूती से कदम आगे बढ़ा रहा है।

Search

Archives