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कांग्रेस के संकटमोचक डीके शिवकुमार संभालेंगे कर्नाटक की कमान, जानें कैसे तय किया सफर?

नई दिल्ली। डीके शिवकुमार अब कर्नाटक के अगले मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। गुरुवार को सिद्दारमैया के इस्तीफे के बाद उनके मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया। यह डीके शिवकुमार के लंबे राजनीतिक सफर का अहम पड़ाव माना जा रहा है।

बेंगलुरु स्थित डीके शिवकुमार के घर के बाहर उनके समर्थकों ने मिठाइयां बांटकर जश्न मनाया। वहीं कलबुर्गी में भारतीय युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने शरण बसवेश्वर मंदिर में विशेष पूजा की और मांग की कि अगर डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री बनते हैं तो प्रियंक खड़गे को उपमुख्यमंत्री बनाया जाए।

डीके शिवकुमार को कांग्रेस का भरोसेमंद संकटमोचक और मजबूत संगठनकर्ता माना जाता है। उन्होंने छात्र राजनीति से अपना सफर शुरू किया और धीरे-धीरे कर्नाटक कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हो गए।

डीके शिवकुमार ने 18 साल की उम्र में कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई से राजनीति शुरू की। 1981 से 1983 के बीच वह बेंगलुरु जिला एनएसयूआई के अध्यक्ष रहे। बाद में वह युवा कांग्रेस से जुड़े और कर्नाटक इकाई के महासचिव बने।

1985 में कांग्रेस ने उन्हें सथानूर विधानसभा सीट से जनता दल के दिग्गज नेता और पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा के खिलाफ चुनाव मैदान में उतारा। वह चुनाव हार गए, लेकिन उनकी मजबूत चुनौती ने उन्हें राज्य राजनीति में पहचान दिलाई। 1987 में वह बेंगलुरु ग्रामीण जिला परिषद के सदस्य चुने गए और 1989 में पहली बार कांग्रेस टिकट पर विधायक बने। इसके बाद उन्होंने लगातार अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत की।

कांग्रेस में लगातार बढ़ता प्रभाव :  1990 के दशक में डीके शिवकुमार का कद कांग्रेस में तेजी से बढ़ा। उन्होंने एस बंगरप्पा सरकार को सत्ता में लाने में अहम भूमिका निभाई और बाद में मंत्री बने। वह उस समय राज्य के सबसे युवा मंत्रियों में शामिल थे।

1994 में कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया, लेकिन उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इससे उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक ताकत और जनाधार साफ दिखाई दिया। 1999 में उन्होंने एस एम कृष्णा के नेतृत्व में कांग्रेस की जीत में बड़ी भूमिका निभाई। उस चुनाव में कांग्रेस ने 139 सीटें जीती थीं। बाद में उन्हें सहकारिता मंत्री बनाया गया।

संकटमोचक की बनी पहचान :  डीके शिवकुमार ने शहरी विकास, ऊर्जा और अन्य अहम विभाग भी संभाले। उन्होंने युवाओं और महिलाओं से जुड़ी कई योजनाओं पर काम किया। समय के साथ उनकी पहचान कांग्रेस के संकटमोचक नेता के रूप में बनी।

राजनीतिक संकट के समय विधायकों को एकजुट रखने और गठबंधन वार्ताओं में उनकी अहम भूमिका रही। 1999 में उन्होंने एच डी कुमारस्वामी को सथानूर सीट से हराया था। इसे देवगौड़ा परिवार के खिलाफ उनकी बड़ी राजनीतिक जीत माना गया।

विवादों से भी रहा नाता :  डीके शिवकुमार का राजनीतिक सफर विवादों से भी जुड़ा रहा। 2017 में आयकर विभाग ने उनसे जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी की थी। सितंबर 2019 में प्रवर्तन निदेशालय ने कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में उन्हें गिरफ्तार किया था।

जेल से बाहर आने के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने बड़े स्तर पर उनका समर्थन किया, जिससे उनकी राजनीतिक छवि और मजबूत हुई। 11 मार्च 2020 को सोनिया गांधी ने उन्हें कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया। इसके बाद उन्होंने राज्य में पार्टी संगठन को मजबूत करने का काम शुरू किया।

2023 चुनाव के बाद बढ़ा कद :  2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में डीके शिवकुमार ने सिद्धारमैया के साथ मिलकर कांग्रेस के प्रचार की कमान संभाली। कांग्रेस ने भाजपा को हराकर राज्य में सत्ता हासिल की। उस समय मुख्यमंत्री पद के लिए डीके शिवकुमार का नाम भी प्रमुख दावेदारों में था।

लेकिन पार्टी ने सिद्दारमैया को मुख्यमंत्री बनाया और डीके शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी दी। पार्टी के भीतर कई नेता मानते हैं कि छात्र राजनीति से शुरू हुआ उनका सफर अब मुख्यमंत्री पद तक पहुंचकर एक बड़े मुकाम पर पहुंच गया है।

सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश :  डीके शिवकुमार और उनके समर्थकों ने वोक्कालिगा समुदाय से आगे बढ़कर पंचमसाली लिंगायत समुदाय में भी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की। कांग्रेस के कई पंचमसाली नेता, जिनमें लक्ष्मी हेब्बालकर भी शामिल हैं, डीके शिवकुमार के करीबी माने जाते हैं।

उन्होंने समुदाय के धार्मिक नेताओं और संगठनों से भी संपर्क बढ़ाया। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह रणनीति भाजपा-जेडीएस गठबंधन के सामाजिक समीकरणों का मुकाबला करने और पूरे कर्नाटक में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश का हिस्सा मानी जा रही है।

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