यौन अपराधों की मीडिया रिपोर्टिंग पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त हिदायत, सनसनीखेज सुर्खियों और भड़काऊ विवरणों से बचें, पीड़ितों की गरिमा रखें सर्वाेपरि
नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को देश के मीडिया संस्थानों, पत्रकारों और डिजिटल प्रकाशन मंचों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वे यौन अपराधों से जुड़ी खबरों को अत्यधिक जिम्मेदारी, संवेदनशीलता और संयम के साथ कवर करें।
शीर्ष अदालत ने जोर देकर कहा है कि टीआरपी या ध्यान खींचने के लिए बनाई गईं सनसनीखेज सुर्खियां और अपराध का भयावह या उत्तेजक चित्रण किसी भी प्रकार के जनहित की पूर्ति नहीं करता, बल्कि यह पीड़ितों और उनके परिजनों को गहरा मानसिक आघात पहुंचाता है।
तीन गंभीर मामलों पर सुप्रीम कोर्ट का स्वत: संज्ञान
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने दिल्ली में हाल ही में घटी तीन दर्दनाक घटनाओं पर संज्ञान लेते हुए यह दिशा-निर्देश जारी किए।
आस्था कुंज पार्क (दक्षिण दिल्ली): 17 वर्षीय नाबालिग लड़की से कथित सामूहिक दुष्कर्म।
स्वरूप नगर (दिल्ली): नाबालिग लड़की के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या।
चलती स्लीपर बस: नाबालिग लड़की से कथित यौन उत्पीड़न का मामला।
इन घटनाओं की संवेदनशीलता को देखते हुए अदालत ने टिप्पणी की कि निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले मीडिया रिपोर्टिंग के संवैधानिक और नैतिक दायित्वों को रेखांकित करना अनिवार्य है।
कोर्ट की मुख्य चेतावनियां और निर्देश
संवैधानिक एवं नैतिक दायित्वः पीठ ने कहा कि यौन अपराधों को कवर करते समय पत्रकारों और मीडिया हाउस को अपनी नैतिक जिम्मेदारी के प्रति पूरी तरह सजग रहना चाहिए। चर्चा का मुख्य केंद्र हमेशा ‘न्याय और सुरक्षा’ होना चाहिए, न कि रिपोर्टिंग को मसालेदार बनाना।
पहचान उजागर करने पर पूर्ण प्रतिबंध: अदालत ने प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया को कड़े कानूनी प्रावधानों की याद दिलाई। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 72 और पॉक्सो अधिनियम की धारा 23 के तहत किसी भी पीड़ित या नाबालिग बच्चे की पहचान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उजागर करना कानूनन दंडनीय अपराध है।
जिला प्रशासन को निर्देश: पीठ ने जिला प्रशासन को निर्देश दिया है कि वे स्थानीय मीडिया प्रतिनिधियों के साथ तुरंत बैठकें आयोजित करें।
हेल्पलाइन व सुरक्षा कॉलम: समाचार पत्रों में एक विशेष कॉलम तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर समय-समय पर सुरक्षा उपायों और आपातकालीन हेल्पलाइन/टेलीफोन नंबरों का प्रसारण अनिवार्य किया जाए, ताकि किसी भी खतरे की आशंका में नागरिक तुरंत सहायता प्राप्त कर सकें।







