यूपी की सड़कों पर इन दिनों जिस ‘बाहुबली’ ट्रक की दीवानगी सिर चढ़कर बोल रही है, वह चंदौली से बनारस पहुंच चुका है। यह ओडिशा के पारादीप बंदरगाह से बलरामपुर चीनी मिल के लिए 200 टन का वैक्यूम बॉयलर लेकर निकला है और इसमें 308 पहिये लगे हैं। सड़कों को चौड़ा करने, बिजली के तार हटाने और पुल तोड़ने जैसी चुनौतियों के बीच यह सफर सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है।
क्या लदा है इस ट्रक पर? : बेल्जियम से समुद्री रास्ते से ओडिशा के पारादीप बंदरगाह पर पहुंची करीब 200 टन वजनी एक वेसल है। ये कोई आम मशीन नहीं है। बलरामपुर चीनी मिल के कुंभी यूनिट में बन रहे एथनॉल प्लांट के लिए एक औद्योगिक वैक्यूम बॉयलर है।
यह प्लांट देश का पहला बायोप्लास्टिक (पॉलीलैक्टिक एसिड) मैन्युफैक्चरिंग प्लांट होगा। यानी गन्ने से एथनॉल बनेगा और एथनॉल से बायोप्लास्टिक. ये मशीन करीब 100 फीट लंबी और 7 मीटर चौड़ी है। यह एक यूनिट में बनी है यानी इसे तोड़कर या हिस्सों में बांटकर नहीं ले जाया जा सकता।
308 पहियों का नंबर ही क्यों? : ये आम ट्रक नहीं है। ये एक मल्टी-एक्सल मॉड्यूलर हाइड्रोलिक ट्रेलर है। समझने वाली बात ये है कि 200 टन का वजन अगर कम पहियों पर डाला जाए तो सड़क टूट जाएगी और पुल ढह जाएंगे। मॉड्यूलर हाइड्रोलिक ट्रेलर का डिजाइन ही यही होता है कि भारी वजन को सैकड़ों पहियों में बराबर-बराबर बांटा जाए। हर पहिये पर कुछ टन का दबाव पड़े, ताकि सड़क सह ले।
हाइड्रोलिक सस्पेंशन सिस्टम की मदद से लोड को संतुलित रखा जाता है। भारत सरकार के मॉड्यूलर हाइड्रोलिक ट्रेलर नियमों में एक्सल लाइन, मॉड्यूल और कई मॉड्यूल को जोड़कर बड़े कॉन्फिगरेशन बनाने की इजाजत है।
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की गाइडलाइन के मुताबिक, मॉड्यूलर हाइड्रोलिक ट्रेलर से सिंगल इंडिविजिबल लोड ले जाने की इजाजत है, बशर्ते हर एक्सल रो पर 18 टन से ज्यादा वजन न पड़े। 200 टन का वजन 18 टन प्रति एक्सल के हिसाब से बांटने पर कई एक्सल लगाने ही पड़ेंगे। हर एक्सल पर कम से कम 4 पहिये होते हैं। इसी लिहाज से 308 पहिये जुड़ते चले गए। यही ट्रक वोल्वो का सबसे हैवी मॉडल है, जिसकी इंजन पावर इतनी है कि चलने पर जमीन थर्रा जाती है।
ट्रक चली तो सही, लेकिन रास्ता बनाना पड़ा : इस काफिले में सिर्फ एक ट्रक नहीं है। साथ में 64 से ज्यादा इंजीनियर और कर्मचारी चल रहे हैं। दो अलग-अलग क्रेन लगी हैं। दो ट्रेलर हैं जो बारी-बारी से मल्टी-एक्सल ट्रेलर को खींचते हैं। दिन में सिर्फ 10 से 20 किलोमीटर ही चल पाता है।
अब तक इस ट्रक पर 2 करोड़ रुपये का डीजल खर्च हो चुका है और यह रोजाना करीब 200 लीटर डीजल पी रहा है। इसके अलावा, ओडिशा से लखीमपुर तक इस पूरे ऑपरेशन का अनुमानित खर्च 15 से 20 करोड़ रुपये के बीच बताया जा रहा है।
रास्ते में कई जगह बिजली की लाइनें हटानी पड़ीं और फुट ओवरब्रिज के हिस्से काटने पड़े। वाराणसी में NH-19 पर दो फुट ओवरब्रिज और स्वर्वेद मंदिर के पास एक और ढांचा रास्ते में आ रहा है, जिनके हिस्से हटाए जाएंगे और ट्रक निकलने के बाद फिर से बनाए जाएंगे।
ट्रक ही क्यों, ट्रेन या बड़ा जहाज क्यों नहीं? : ये मशीन इतनी बड़ी है कि न तो ट्रेन में लोड हो सकती है, न ही इसे हिस्सों में तोड़ा जा सकता है। सड़क मार्ग ही एकमात्र रास्ता है. बंदरगाह से सीधे प्लांट तक कोई रेलवे लाइन भी नहीं जाती। इस वजह से इसे मॉड्यूलर हाइड्रोलिक ट्रेलर पर लादकर सड़क से ही लाया जा रहा है।
भारत सरकार के नियमों में ओवर डायमेंशनल कार्गो को नेशनल हाईवे पर ले जाने की इजाजत है, बशर्ते रूट परमिशन ली जाए और एक्सल लोड की शर्तें पूरी हों।
ये ट्रक इतनी बड़ी बात क्यों बन गया? : यह भारत की हेवी-हॉलेज इंजीनियरिंग का नमूना है। JM बक्शी ग्रुप जैसी कंपनी इसे संभाल रही है, जिसने पहले भी देश में सबसे भारी हेवी-हॉल ऑपरेशन का रिकॉर्ड बनाया है।
पारादीप पोर्ट से लखीमपुर खीरी तक करीब 1,400 किलोमीटर का सफर है और दिन में 10-20 किलोमीटर की रफ्तार से ये महीनों में पहुंचेगा। हर एक शहर में लोग इस ट्रक को देखने के लिए जुट रहे हैं। कोई सेल्फी ले रहा है तो कोई वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल रहा है।
एक बड़ी और हैरान करने वाली बात यह है कि बेल्जियम से चली यह मशीन अप्रैल से अब तक यानी करीब 6 महीने में भी अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाई है। ट्रक झारखंड और बिहार होते हुए यूपी पहुंचा है और अब वाराणसी से गाजीपुर के रास्ते बलरामपुर की ओर बढ़ेगा। माना जा रहा है कि नवरात्रि से पहले यह मशीन अपनी मंजिल तक पहुंच सकती है।







